Tuesday, August 16, 2022

ब्लैकबोर्ड:मस्जिदों से नारे गूंजे और लड़कियां गायब होने लगीं, रेप के बाद उनकी लाशें दरिया में बहती मिलीं.. पढ़िए कश्मीर की कहानी

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फूलों की वादियों, झरनों और तीखी पत्तियों वाले देवदार से घिरे कश्मीर का बेइंतिहा खूबसूरत टुकड़ा है- सोपोर। यहां की हवाएं भी लाल-रसीले सेबों की खुशबुओं से महका करती थीं, लेकिन साल 1990 के बाद मंजर बदल गया। अब सेब के बागान सूख चुके हैं। बासी खून की महक दम घोंटती है। हंसते-खिलखिलाते घरों की जगह जले हुए खंडहर मिलेंगे। ये हिस्सा, चेहरा है दहशत के उस कैलेंडर का, जिसकी फड़फड़ाहट ने लाखों कश्मीरी पंडितों को अपना सब कुछ छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

हवेलीनुमा घरों में रहते हिंदू एक सूटकेट लेकर भागे और अब बित्ता-भर कमरों में भेड़-बकरियों की तरह जी रहे हैं। नब्बे की 19 जनवरी को परिवार समेत घर से निकली शीतल कौल कहती हैं कि क्या-क्या लेते! दुमंजिला घर था, ऊपर-नीचे छह-छह कमरे। यहां जिस कमरे में रहते हैं, उतना बड़ा तो किचन था। गायें थीं, बकरियां थीं, जमीनें, सेब-अखरोट के कई बागान- इतना कुछ था। मस्जिदों से एक आवाज आई और हम सूटकेस में कपड़े ठूंस रातोंरात निकल गए। और घर? वो उन लोगों ने जला दिया!

ऐसा कहते हुए शीतल की आवाज थरथराती है। 32 साल से बंद आंसू कपाट तोड़कर बाहर ढुलकने लगते हैं। पूरी बातचीत के दौरान वो बार-बार दुपट्टे से आंखें पोंछती और हाथों से वीडियो रोकने का इशारा करती रहीं। शीतल उन सैकड़ों कश्मीरी पंडितों में से एक हैं, जो कश्मीर छोड़कर भागीं और अब दिल्ली के रोहिणी के पास कस्बेनुमा गांव मंगोलपुर कलां में रहती हैं।

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